Ranchi News : झारखंड हाई कोर्ट ने वर्ष 2004 के नक्सलवाद से जुड़े एक मामले में 19 साल बाद प्रमिला देवी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल किसी नक्सली की पत्नी होना या घटनास्थल पर मौजूद होना किसी व्यक्ति को अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
हाई कोर्ट ने गुमला की निचली अदालत द्वारा 7 अप्रैल 2007 को सुनाई गई दोषसिद्धि और 9 अप्रैल 2007 को सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मामले के सभी तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया था।
2004 की मुठभेड़ का मामला, हाई कोर्ट बोला- न हथियार मिला, न अपराध में संलिप्तता का ठोस सबूत
गुमला की निचली अदालत ने प्रमिला देवी को हत्या के प्रयास, सरकारी कार्य में बाधा डालने, लूट का सामान रखने, आर्म्स एक्ट और अन्य धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए आठ वर्ष तक की सजा सुनाई थी।
यह मामला वर्ष 2004 का है। गुमला जिले के बिशुनपुर थाना क्षेत्र के निनार गांव में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी। पुलिस का दावा था कि इस मुठभेड़ में दो नक्सली मारे गए थे, जबकि प्रमिला देवी और एक अन्य महिला को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने यह भी कहा था कि प्रमिला देवी प्रतिबंधित नक्सली संगठन के सब-जोनल कमांडर प्रतुल भुइयां उर्फ रंधीरजी की पत्नी थीं।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि प्रमिला देवी के पास से कोई हथियार या आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई थी। उनके किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल होने का कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य भी अभियोजन पक्ष प्रस्तुत नहीं कर सका।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि प्रमिला देवी करीब 7 वर्ष 8 महीने जेल में रह चुकी हैं। वर्ष 2011 में सजा पूरी करने और जुर्माना जमा करने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था। इसके बावजूद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उन्हें पूरी तरह बरी किया जाना आवश्यक था।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि डेढ़ साल की बच्ची को गोद में लेकर घटनास्थल पर मौजूद होना और किसी नक्सली की पत्नी होना किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि प्रमिला देवी किसी प्रतिबंधित नक्सली संगठन की सक्रिय सदस्य थीं।