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  • 2026-06-21

National News: अल नीनो की दस्तक से भारत के मानसून पर संकट, कमजोर बारिश से खेती और महंगाई पर बढ़ सकता है दबाव

National News: भारत इस साल पिछले कई वर्षों के सबसे चुनौतीपूर्ण मानसून सीजन का सामना कर सकता है. पहले से जारी भीषण गर्मी ने देश में खेती, बिजली व्यवस्था और आम लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हैं. अब मौसम वैज्ञानिकों ने मानसून को लेकर एक और चिंता सामने रखी है.

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Nino) की स्थिति सक्रिय हो रही है, जिसका असर जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसूनी बारिश पर पड़ सकता है. अनुमान है कि इस बार बारिश सामान्य से कम रह सकती है.

बारिश में पहले ही दर्ज हुई बड़ी कमी
IMD ने इस मानसून सीजन में बारिश को लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का करीब 90 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है. 1 जून से 16 जून के बीच देश में सामान्य से करीब 35 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है. कृषि क्षेत्र पर इसका असर देखते हुए कई राज्यों को संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया है. भारत में आज भी बड़ी आबादी की आय कृषि से जुड़ी हुई है. ऐसे में कमजोर मानसून का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों की आमदनी और बाजार की मांग पर पड़ सकता है.

कृषि हिस्सेदारी कम, लेकिन निर्भरता अब भी ज्यादा
देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान पहले की तुलना में घटा है, लेकिन ग्रामीण भारत की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है. यही वजह है कि मानसून की कमी सिर्फ फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि ग्रामीण आय और उपभोक्ता खर्च पर भी असर डालती है.

इसके अलावा खुदरा महंगाई में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी करीब 37 प्रतिशत है. ऐसे में अगर बारिश कम होती है तो अनाज, सब्जियों और अन्य जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.

क्या इस बार हालात ज्यादा खराब होंगे?
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार अल नीनो का असर पहले के मुकाबले उतना व्यापक नहीं हो सकता.

पिछले कुछ वर्षों में खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कई बदलाव हुए हैं-
  • सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ है 
  • फसलों में विविधता बढ़ी है 
  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का सहारा मिला है 
  • डायरेक्ट कैश ट्रांसफर जैसी योजनाओं से किसानों को मदद मिली है 

इकोनॉमिक सर्वे 2024-25 के अनुसार, देश का करीब 55 प्रतिशत बुआई क्षेत्र अब सिंचाई के दायरे में है, जबकि एक दशक पहले यह आंकड़ा करीब 49 प्रतिशत था.

अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ेगा असर?
कमजोर मानसून से अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ना तय माना जा रहा है, लेकिन भारत के पास अब पहले से बेहतर सुरक्षा कवच मौजूद हैं. सरकारी बफर स्टॉक, सिंचाई नेटवर्क, MSP व्यवस्था और ग्रामीण योजनाएं मानसून के झटके को कम करने में मदद कर सकती हैं.

हालांकि पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख अनाज उत्पादक राज्यों में जुलाई-अगस्त के दौरान बारिश की स्थिति बेहद अहम होगी. अगर इन इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बनती है तो इसका असर खाद्य उत्पादन और महंगाई पर ज्यादा दिखाई दे सकता है. फिलहाल विशेषज्ञों की नजर अगले 4 से 6 हफ्तों की बारिश पर है. यही तय करेगी कि इस बार का अल नीनो सिर्फ एक अस्थायी चुनौती साबित होगा या फिर महंगाई और आर्थिक विकास के लिए बड़ी परेशानी खड़ी करेगा.
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