Tatanagar Railway News: झारखंड और आसपास के इलाकों के हजारों आम यात्रियों के लिए मेमू ट्रेनें सिर्फ एक परिवहन साधन नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की धड़कन हैं. इन्हीं ट्रेनों के सहारे छात्र पढ़ाई के लिए निकलते हैं, मजदूर काम पर पहुंचते हैं और कर्मचारी समय पर अपने दफ्तर जाने की उम्मीद रखते हैं. लेकिन जब यही ट्रेनें लगातार घंटों देरी से चलें, तो सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जिनके पास समय और पैसे दोनों की सीमित गुंजाइश होती है.
आज टाटानगर पहुंचने वाली कई मेमू ट्रेनें लेट
9 जून 2026 को टाटानगर पहुंचने वाली कई मेमू ट्रेनें 1 से लेकर लगभग 3 घंटे तक देरी से पहुंचीं. इससे यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा.
68044 राउरकेला-टाटा मेमू राउरकेला से सुबह 5:10 बजे रवाना हुई थी. इसे टाटानगर 9:20 बजे पहुंचना था, लेकिन ट्रेन 10:26 बजे पहुंची. यानी यह 1 घंटा 6 मिनट देरी से चली. 163 किलोमीटर का सफर, जो सामान्य रूप से 4 घंटे 10 मिनट में पूरा होना चाहिए था, उसे पूरा करने में 5 घंटे 16 मिनट लग गए.
68126 बड़बिल-टाटा मेमू सुबह 6:15 बजे बड़बिल से चली थी. इसका निर्धारित आगमन समय 10:10 बजे था, लेकिन यह ट्रेन 13:02 बजे टाटानगर पहुंची। इस तरह ट्रेन 2 घंटे 52 मिनट लेट रही. 150 किलोमीटर की दूरी तय करने में इसे 6 घंटे 47 मिनट लगे, जबकि निर्धारित समय 3 घंटे 55 मिनट था.
68086 बरकाकाना-टाटा मेमू सुबह 6:00 बजे बरकाकाना से रवाना हुई. इसे 10:35 बजे टाटानगर पहुंचना था, लेकिन ट्रेन 12:15 बजे पहुंची. यानी 1 घंटा 40 मिनट की देरी हुई. 162 किलोमीटर का सफर 6 घंटे 5 मिनट के बजाय 7 घंटे 45 मिनट में पूरा हुआ.
68024 पुरुलिया-झारग्राम मेमू पुरुलिया से 9:50 बजे चली थी और 12:02 बजे टाटानगर पहुंचने का समय था. लेकिन ट्रेन 14:45 बजे पहुंची. यह 2 घंटे 43 मिनट की देरी से चली. 90 किलोमीटर की दूरी तय करने में इसे 4 घंटे 55 मिनट लग गए, जबकि निर्धारित समय 2 घंटे 12 मिनट था.
वहीं 68004 गुवा-टाटा मेमू गुवा से शाम 7:10 बजे रवाना हुई थी. इसे रात 10:50 बजे टाटानगर पहुंचना था, लेकिन ट्रेन अगले दिन रात 1:23 बजे पहुंची. यानी 2 घंटे 33 मिनट की देरी हुई. 148 किलोमीटर का सफर 3 घंटे 40 मिनट के बजाय 6 घंटे 13 मिनट में पूरा हुआ.
यात्रियों ने उठाया सवाल
लगातार हो रही देरी को लेकर यात्रियों में नाराजगी बढ़ रही है. उनका कहना है कि लंबी दूरी की ट्रेनों की समयपालन पर तो अक्सर चर्चा होती है, लेकिन रोजाना सफर करने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय यात्रियों की जीवनरेखा मानी जाने वाली मेमू ट्रेनों की बदहाल स्थिति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता. इसके साथ ही यात्रियों का सवाल है कि जब हर दिन हजारों लोग इन ट्रेनों पर निर्भर हैं, तो आखिर उनके समय की कीमत कब समझी जाएगी?