Brain Tumor Study: प्रयागराज स्थित मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के न्यूरो सर्जरी विभाग की एक महत्वपूर्ण रिसर्च ने ब्रेन कैंसर के गंभीर मरीजों के लिए नई उम्मीद जगाई है. अध्ययन में सामने आया है कि चौथे चरण के खतरनाक ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित मरीज भी सही इलाज और आधुनिक जांच तकनीक की मदद से कई वर्षों तक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं. इस शोध में शामिल कई मरीजों में ऑपरेशन के बाद लंबे समय तक दोबारा ट्यूमर विकसित नहीं हुआ, जिसे विशेषज्ञ बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं.
पांच साल पहले शुरू हुई रिसर्च में 45 गंभीर मरीजों को किया गया शामिल
न्यूरो सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. पंकज गुप्ता और उनकी टीम ने वर्ष 2020 में इस अध्ययन की शुरुआत की थी. रिसर्च में कुल 45 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जो चौथे चरण के ब्रेन कैंसर से जूझ रहे थे. इनमें 20 पुरुष और 25 महिलाएं थीं, जिनकी उम्र 50 से 70 वर्ष के बीच थी.
इन सभी मरीजों का सफल ऑपरेशन किया गया और उनके मस्तिष्क से ट्यूमर को पूरी तरह निकाल दिया गया. इसके बाद मरीजों की स्थिति और बीमारी के व्यवहार को समझने के लिए लगातार निगरानी की गई.
मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग ने इलाज की दिशा बदल दी
इस अध्ययन की सबसे अहम कड़ी मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग रही. इस आधुनिक तकनीक के जरिए मरीजों की कोशिकाओं के भीतर मौजूद डीएनए और आरएनए का विस्तृत विश्लेषण किया गया. इससे डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिली कि ट्यूमर किस कारण विकसित हो रहा है और आगे इसके दोबारा बनने की कितनी संभावना है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के कारण इलाज को मरीज की स्थिति के अनुसार अधिक सटीक और प्रभावी बनाया जा सकता है.
दो तरह के कैंसर सामने आए, नतीजों ने डॉक्टरों को भी चौंकाया
अध्ययन के दौरान मरीजों में मुख्य रूप से दो प्रकार के कैंसर पाए गए. इनमें करीब 10 प्रतिशत मरीजों में आईडीएच म्यूटेंट प्रकार का कैंसर मिला, जबकि बाकी मरीज आईडीएच वाइल्ड टाइप श्रेणी में थे.
रिसर्च के दौरान सबसे सकारात्मक बात यह सामने आई कि आईडीएच वाइल्ड टाइप वाले मरीजों में ऑपरेशन के बाद पूरे पांच वर्षों तक दोबारा नया ट्यूमर विकसित नहीं हुआ. चिकित्सा क्षेत्र में इसे एक उत्साहजनक संकेत माना जा रहा है.
कुछ मरीजों में छह महीने से डेढ़ साल के भीतर लौटा ट्यूमर
जिन मरीजों में आईडीएच म्यूटेंट प्रकार का कैंसर पाया गया, उनमें छह महीने से लेकर करीब डेढ़ साल के भीतर ट्यूमर दोबारा बनने के संकेत मिले. ऐसे मरीजों की स्थिति पर नजर रखने के लिए नियमित अंतराल पर सीटी स्कैन और एमआरआई जांच कराई गई.
डॉ. पंकज गुप्ता के अनुसार चौथे चरण का ब्रेन ट्यूमर सामान्य रूप से बेहद गंभीर और जानलेवा माना जाता है. लेकिन समय रहते सही जांच और वैज्ञानिक तरीके से इलाज की योजना तैयार की जाए तो मरीजों को लंबे समय तक बेहतर जीवन दिया जा सकता है.
ऑपरेशन के बाद कई मरीज पांच से सात साल या उससे अधिक समय तक रहे सुरक्षित
रिसर्च के दौरान यह भी सामने आया कि कई मरीज ऑपरेशन के बाद पांच से सात वर्ष या उससे भी अधिक समय तक सामान्य जीवन जी रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बायोप्सी के साथ मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग भी कराई जाए तो बीमारी को नियंत्रित करना पहले की तुलना में अधिक आसान हो सकता है.
इससे डॉक्टरों को यह अंदाजा लगाने में भी मदद मिलती है कि भविष्य में ट्यूमर दोबारा बनने की संभावना कितनी है और मरीज को किस तरह की निगरानी की जरूरत होगी.
लाखों मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बन सकती है नई तकनीक
इस अध्ययन के मुताबिक अगर शुरुआती चरण में ही मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग कर ली जाए तो इलाज की रणनीति अधिक प्रभावी बनाई जा सकती है. साथ ही ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति पर बेहतर तरीके से नजर रखी जा सकती है.
इस महत्वपूर्ण शोध में डॉ. अमित सिंह, डॉ. एनएन गोपाल और डॉ. राजीव गौतम की भी अहम भूमिका रही. इस अध्ययन को वर्ष 2025 में न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया आइकॉन में प्रस्तुत किए जाने की तैयारी की गई है.
मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज की यह रिसर्च ब्रेन कैंसर के क्षेत्र में एक सकारात्मक और उम्मीद भरा संकेत लेकर आई है. अध्ययन से यह साफ हुआ है कि आधुनिक तकनीक, समय पर जांच और सटीक उपचार की मदद से चौथे चरण के ब्रेन कैंसर के मरीजों को भी लंबा और बेहतर जीवन दिया जा सकता है. ऐसे में मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग भविष्य में ब्रेन ट्यूमर के इलाज का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है.