Urdu Poet Bashir Badr Passed Away: उर्दू शायरी और गजल की दुनिया से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है. अपनी नरम एहसास वाली शायरी और दिल को छू लेने वाले अल्फाज से लाखों लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे. भोपाल में 91 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली. उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य जगत, शायरी पसंद करने वाले लोगों और उनके चाहने वालों के बीच शोक की लहर दौड़ गई.
बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि वो ऐसा नाम थे जिन्होंने मुश्किल उर्दू को आम लोगों की जुबान तक पहुंचाया. उनकी गजलें गांव से लेकर शहर तक, महफिलों से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह लोगों की जुबान पर रहती थीं. उनके लिखे कई शेर आज भी लोग अपने जज्बात बयां करने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से जूझ रहे थे बशीर बद्र
बताया जा रहा है कि बशीर बद्र पिछले लंबे समय से डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से परेशान थे. उम्र बढ़ने के साथ उनकी याददाश्त काफी कमजोर हो गई थी. कई बार वे अपने करीबी लोगों को भी पहचान नहीं पाते थे. पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की वजह से वे काफी कमजोर हो चुके थे.
उनके निधन की खबर आते ही साहित्य और कला जगत से जुड़े लोग उन्हें याद कर भावुक हो उठे. सोशल मीडिया पर भी लोग उनकी गजलें और शेर साझा कर श्रद्धांजलि दे रहे हैं.
अयोध्या से निकलकर पूरे देश में बनाया बड़ा नाम
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की और वहीं से पीएचडी भी पूरी की. बाद में वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्रोफेसर भी बने.
उन्होंने गजल को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि आम जिंदगी से जोड़ दिया. उनकी शायरी में प्यार, दर्द, रिश्ते, इंसानियत और समाज की सच्चाई बहुत सादगी से दिखाई देती थी. यही वजह रही कि उनकी गजलें हर उम्र के लोगों के दिल तक पहुंचीं.
आम बोलचाल की भाषा में लिखी शायरी ने बनाया लोगों का पसंदीदा
बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत उनकी सरल भाषा थी. वे मुश्किल शब्दों की जगह रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली भाषा को अपनी गजलों में शामिल करते थे. यही कारण था कि उनकी शायरी सिर्फ साहित्य प्रेमियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम लोग भी खुद को उससे जोड़ पाते थे.
उनकी कई गजलें और शेर आज भी महफिलों, मुशायरों और सोशल मीडिया पर खूब सुनाई देते हैं. उन्होंने उर्दू शायरी को नई पहचान देने का काम किया. साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया था.
1987 के दंगों में जल गया था घर और बिखर गई थीं यादें
बशीर बद्र की जिंदगी में एक ऐसा दौर भी आया जिसने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था. साल 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान उनका घर जला दिया गया था. इस दर्दनाक घटना में उनकी कई अनमोल और अप्रकाशित रचनाएं भी हमेशा के लिए नष्ट हो गई थीं.
बताया जाता है कि इस हादसे का असर उनके जीवन और सोच दोनों पर पड़ा. इसके बाद वे भोपाल आकर बस गए और वहीं रहते हुए उन्होंने अपने साहित्यिक सफर को आगे बढ़ाया.
साहित्य जगत में कभी न भरने वाला खालीपन
बशीर बद्र के जाने से उर्दू शायरी की दुनिया में एक बड़ा खालीपन महसूस किया जा रहा है. उनकी गजलें सिर्फ अल्फाज नहीं थीं, बल्कि लोगों के दिलों की आवाज थीं. झारखंड से लेकर देश के अलग अलग हिस्सों तक उन्हें चाहने वाले लोग आज उन्हें याद कर भावुक हो रहे हैं.
उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मिसाल बनी रहेगी. शब्दों से लोगों के दिलों को जोड़ने वाला यह महान शायर भले ही आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी लिखी गजलें हमेशा जिंदा रहेंगी.