Tribal Heritage Place: जमशेदपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित नुडुंडीह गांव आज भी अपनी पारंपरिक संस्कृति और लोक आस्था के लिए जाना जाता है। घने जंगलों, पहाड़ियों और नदी किनारे बसे इस गांव में मौजूद “कितपाथ ठाकुर” पूजा स्थल वर्षों से लोगों की श्रद्धा और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय लोग इसे एक पवित्र स्थल मानते हैं, जहां आज भी पुराने रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है।
मंदिर नहीं, बल्कि पारंपरिक आस्था का स्थल
ग्रामीणों के अनुसार यह कोई साधारण मंदिर नहीं, बल्कि गांव की कुलदेवी “कितपाथ ठाकुर” का पारंपरिक पूजा स्थान है। यहां पीढ़ियों से पूजा होती आ रही है और गांव के लोग इसे अपनी संस्कृति और पहचान का हिस्सा मानते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस स्थल से उनकी गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है।
राजा भरत सिंह से जुड़ी बताई जाती है परंपरा
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि इस पूजा परंपरा की शुरुआत राजा भरत सिंह ने की थी। तभी से गांव के लोग और उनका परिवार इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। समय बदलने के बावजूद ग्रामीणों ने इस पूजा स्थल की मान्यताओं और परंपराओं को आज भी जीवित रखा है।
घने जंगलों के बीच स्थित है पूजा स्थल
कितपाथ ठाकुर स्थान गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर जंगलों और पहाड़ी रास्तों के बीच स्थित है। यहां पहुंचने के लिए लोगों को कच्चे रास्तों और नदी किनारे से होकर गुजरना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि पास से बहने वाली नदी चांडिल क्षेत्र से होकर इस इलाके तक पहुंचती है। प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह इलाका लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। शांत वातावरण, ऊंचे पहाड़ और घने जंगल इस जगह को और भी खास बनाते हैं।
घोड़े और हाथी की प्रतिमाएं बढ़ाती हैं आकर्षण
पूजा स्थल पर एक ओर घोड़े की प्रतिमा और दूसरी ओर हाथी की प्रतिमा स्थापित है। बीच में कुलदेवी “कितपाथ ठाकुर” विराजमान हैं। ग्रामीणों के बीच इस स्थल को लेकर कई लोककथाएं और पारंपरिक मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनकी चर्चा आज भी गांवों में सुनने को मिलती है।
सावन के दूसरे मंगलवार को लगता है मेला
ग्रामीणों के अनुसार हर मंगलवार यहां पूजा की जाती है, लेकिन सावन महीने का दूसरा मंगलवार सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन विशेष पूजा और मेले का आयोजन होता है, जिसमें जमशेदपुर और आसपास के कई इलाकों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पूजा के दौरान श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद और भोग का वितरण किया जाता है। गांव वालों का कहना है कि इस मौके पर यहां काफी भीड़ उमड़ती है और पूरा इलाका भक्तिमय माहौल में डूब जाता है।
आदिवासी परंपरा और लोक संस्कृति का प्रतीक
स्थानीय लोगों के मुताबिक पूजा के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। यही कारण है कि यह स्थल आदिवासी संस्कृति और लोक परंपराओं का भी अहम केंद्र माना जाता है। जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित यह रहस्यमयी स्थल आज भी लोगों के आकर्षण और चर्चा का विषय बना हुआ है।