GST Impact: जीएसटी 2.0 लागू होने के बाद आम उपभोक्ताओं को राहत जरूर मिली है, क्योंकि कई जरूरी चीजें अब सस्ती हो गई हैं। 22 सितंबर 2025 से लागू इस नए टैक्स सिस्टम में 12% स्लैब हटाकर कई वस्तुओं को 5% में लाया गया, जिससे बाजार में मांग बढ़ाने की कोशिश की गई। लेकिन जहां ग्राहकों के चेहरे पर मुस्कान आई है, वहीं कारोबारियों के लिए यह बदलाव नई चुनौतियां लेकर आया है।
उल्टा टैक्स ढांचा बना बड़ी परेशानी
व्यापारियों की मुश्किल का मुख्य कारण “इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर” है, जिसमें कच्चे माल पर ज्यादा और तैयार माल पर कम टैक्स लगता है। उदाहरण के तौर पर, साइकिल बनाने में इस्तेमाल होने वाले स्टील और रबर पर 18% GST लगता है, जबकि तैयार साइकिल पर सिर्फ 5% टैक्स है। इससे व्यापारी पहले ही ज्यादा टैक्स चुका देते हैं और बाद में उन्हें “इनपुट टैक्स क्रेडिट” के जरिए रिफंड का इंतजार करना पड़ता है।
छोटे उद्योगों पर सबसे ज्यादा मार
इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा असर छोटे और मझोले उद्योगों पर पड़ा है। उनका वर्किंग कैपिटल सिस्टम में फंस जाता है, जिससे नकदी संकट गहराता है। फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल और इलेक्ट्रिक व्हीकल जैसे सेक्टर्स इस समस्या से जूझ रहे हैं, जहां इनपुट पर भारी टैक्स और आउटपुट पर कम टैक्स का अंतर उनके मुनाफे को प्रभावित कर रहा है।
रिफंड में देरी से बढ़ी चुनौती
सैद्धांतिक रूप से अतिरिक्त टैक्स का रिफंड मिलना चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर इसमें महीनों की देरी होती है। लंबी कागजी प्रक्रिया और राज्यों की वित्तीय स्थिति के कारण कारोबारियों का पैसा बिना ब्याज के अटका रहता है। अब सरकार के सामने चुनौती है कि उपभोक्ताओं को राहत देते हुए कारोबारियों की फंसी पूंजी को कैसे जल्दी निकाला जाए, ताकि बाजार और उद्योग दोनों संतुलित रह सकें।