Seraikela News: आज 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर सरायकेला और आदित्यपुर के औद्योगिक क्षेत्रों में एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है. जहां एक ओर सार्वजनिक मंचों से नेताओं और अधिकारियों द्वारा श्रमिकों को राष्ट्र निर्माता बताकर मालाएं पहनाई जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत काफी दर्दनाक है. औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले हजारों श्रमिक आज भी सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी, भविष्य निधि (PF) और कर्मचारी राज्य बीमा (ESIC) जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
8 घंटे का कानून सिर्फ कागजों पर, 12 घंटे की शिफ्ट बनी मजबूरी
श्रम कानूनों के तहत किसी भी मजदूर के लिए काम की अवधि 8 घंटे तय है, लेकिन आदित्यपुर और सरायकेला की कई फैक्ट्रियों में मजदूरों से आज भी 10 से 12 घंटे तक काम लिया जा रहा है. विडंबना यह है कि नियमों के विरुद्ध काम की अतिरिक्त अवधि के लिए मिलने वाले ओवरटाइम का भुगतान भी उचित दर पर नहीं किया जाता. यह स्थिति सीधे तौर पर उन श्रमिक अधिकारों का उल्लंघन है, जिनकी नींव 140 साल पहले शिकागो के मजदूरों ने अपने बलिदान से रखी थी.
सुरक्षा मानकों की अनदेखी और हादसों का शिकार होते मजदूर
फैक्ट्रियों में सुरक्षा उपकरणों का अभाव एक बड़ा संकट बना हुआ है. हेलमेट, सुरक्षा जूते और अन्य आवश्यक उपकरणों के बिना काम करने के कारण आए दिन हादसे होते रहते हैं, जिनका शिकार अधिकांशतः दिहाड़ी और ठेका मजदूर होते हैं. दुर्घटना होने की स्थिति में न तो पीड़ितों को उचित इलाज मिल पाता है और न ही समय पर मुआवजा. अक्सर देखा जाता है कि हादसों के बाद प्रबंधन जिम्मेदारी लेने के बजाय मामले को रफा-दफा करने की कोशिश में जुट जाता है, जो मजदूरों के साथ सरासर धोखा है.
खोखले भाषणों के बीच हक और सम्मान की मांग
मजदूरों का स्पष्ट कहना है कि केवल भाषणों और 1 मई को झंडा फहराने से उनका पेट नहीं भरता. वे हक और सम्मान के साथ न्यूनतम मजदूरी और 8 घंटे से ज्यादा काम करने पर दोगुने भुगतान की गारंटी चाहते हैं. श्रमिकों के अनुसार, जब तक कार्यस्थलों पर रजिस्टरों की पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं होगी और ठेका मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक मजदूर दिवस मनाना केवल एक ढोंग है. आज का दिन प्रशासन और श्रम विभाग के दावों की पोल खोलते हुए व्यवस्था में बड़े सुधार की मांग कर रहा है.