Seraikela: सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल वन विभाग रेंज अंतर्गत ईचागढ़ थाना क्षेत्र के सोड़ो पंचायत स्थित हाड़ात गांव में शुक्रवार की रात जंगली हाथियों ने भीषण उत्पात मचाया, जिसमें एक ही परिवार के दो लोगों की मौत हो गई और दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद वन विभाग ने मृतकों के परिजनों को तत्काल 25-25 हजार रुपये की सहायता राशि दी है और सरकारी प्रावधान के तहत 4-4 लाख रुपये मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, वहीं घायलों के इलाज का पूरा खर्च भी विभाग उठाने की बात कही गई है, लेकिन इस बीच वन क्षेत्र पदाधिकारी की अनुपस्थिति को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी और सवाल भी उठ रहे हैं।
आधी रात घर में घुसा हाथियों का झुंड, मां-बेटी की पर किया हमला
बताया जा रहा है कि देर रात करीब 1 बजे जंगली हाथियों का एक झुंड गांव में घुस आया और सीधे महतो परिवार के कच्चे मकान को निशाना बनाया। हाथियों ने दीवार तोड़कर घर के अंदर प्रवेश किया, जिससे घर में मौजूद लोग अचानक उनकी चपेट में आ गए और अफरा-तफरी का माहौल बन गया। इस दर्दनाक हमले में चाइना देवी और उनकी बेटी अमिता कुमारी की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि कमलचंद महतो के माता-पिता मोहन महतो और सतुला देवी गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद ग्रामीणों ने चीख-पुकार सुनकर मौके पर पहुंचकर मशाल जलाकर किसी तरह हाथियों को गांव से खदेड़ा और घायलों को तत्काल इलाज के लिए जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल पहुंचाया, जहां उनकी हालत नाजुक बनी हुई है।
एक सप्ताह से मंडरा रहा था खतरा
घटना के बाद पूरे हाड़ात गांव में दहशत का माहौल है और ग्रामीणों का कहना है कि पिछले एक सप्ताह से 8 से 10 हाथियों का झुंड इलाके में घूम रहा था, जो पहले फसल को नुकसान पहुंचा रहा था और अब जानलेवा हमले तक पहुंच गया है। सूचना मिलने के बाद चांडिल रेंजर और ईचागढ़ थाना पुलिस मौके पर पहुंची और हालात को संभालने में जुट गई। बताया जा रहा है कि चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी में इस समय हाथियों की मौजूदगी नहीं है, क्योंकि गज परियोजना के तहत पर्याप्त भोजन और पानी की व्यवस्था नहीं होने के कारण पूरा झुंड पलायन कर ईचागढ़ क्षेत्र में आ गया है। शाम होते ही ये हाथी भोजन और पानी की तलाश में जंगल से निकलकर गांवों की ओर रुख कर रहे हैं और घरों को निशाना बना रहे हैं, जहां रखे अनाज को खाते हैं और मिट्टी के घरों को तोड़ देते हैं।
ग्रामीणों में आक्रोश, उठ रहे बड़े सवाल
इस घटना के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश है और लोग प्रशासन से सवाल कर रहे हैं कि आखिर इस समस्या का जिम्मेदार कौन है। ग्रामीणों का कहना है कि हर शाम डर के साए में जीना पड़ता है और कभी भी हाथी आकर जान ले सकते हैं, ऐसे में “तिल-तिल कर मरने से अच्छा है सरकार एक बार ही खत्म कर दे” जैसी पीड़ा भरी बातें सामने आ रही हैं।
करोड़ों खर्च के बावजूद हालात जस के तस
ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया है कि जब वन और पर्यावरण संरक्षण के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं और गज परियोजना जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं, तब भी हाथियों का पलायन क्यों नहीं रुक रहा है और क्यों आम लोग इसकी कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हैं। उनका कहना है कि मुआवजा देकर मामले को खत्म कर दिया जाता है, जबकि स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा।
मुआवजे पर भी उठे सवाल, वन विभाग का दावा और अपील
ग्रामीणों का आरोप है कि झारखंड में अन्य राज्यों की तुलना में मुआवजा कम दिया जाता है और वन विभाग केवल औपचारिकता निभाता है। लगातार बढ़ते हाथी-मानव संघर्ष के कारण अब लोग गांव छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं और सुरक्षित जीवन के लिए शहरों की ओर पलायन करने की सोच रहे हैं।चांडिल रेंजर ने बताया कि दलमा क्षेत्र में पानी और भोजन की कमी के कारण हाथी निचले इलाकों में आ रहे हैं और उन्हें वापस जंगल की ओर खदेड़ने के लिए टीम गठित कर दी गई है। साथ ही मृतकों के परिजनों को 4-4 लाख रुपये मुआवजा देने की प्रक्रिया जारी है और ग्रामीणों से रात में सतर्क रहने तथा जंगल की ओर न जाने की अपील की गई है।
समाधान की मांग तेज
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो हाथी और मानव के बीच संघर्ष और भी भयावह रूप ले सकता है। उन्होंने दलमा क्षेत्र में जल स्रोत और भोजन की समुचित व्यवस्था करने की मांग उठाई है, ताकि हाथियों का पलायन रोका जा सके और गांवों में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।