Ward 17 Adityapur: कहते हैं कि सोए हुए को जगाया जा सकता है, लेकिन जो जागकर सोने का ढोंग करे, उसे जगाने के लिए “एक खबर” ही काफी है. कल तक वार्ड संख्या 17 में कचरे के जिस पहाड़ को स्थानीय पार्षद और नगर निगम के अधिकारी “सौंदर्य” समझकर नजरअंदाज कर रहे थे, शुक्रवार को न्यूज़ 26 में खबर प्रकाशित होते ही शनिवार की सुबह वहां अचानक जेसीबी के इंजनों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी. जो कूड़ा जनप्रतिनिधियों को दिखाई नहीं दे रहा था, वह चंद घंटों की सुर्ख़ियों में ऐसा खटका कि आनन-फानन में पूरी मशीनरी सफाई के “फोटो सेशन” में जुट गई.
पार्षद महोदया को “इंटरनेशनल” लगा सच, जनता ने दिखाया आईना
हैरानी की बात तो यह है कि जब धरातल की सड़ांध को शब्दों में पिरोया गया, तो इलाके की महिला पार्षद की आंखें खुल गईं. हालांकि, सफाई करने की बजाय वे इस कड़वे सच से बिलबिला उठीं. जनता के सवालों का सामना हुआ तो विकास के दावों की हवा निकल गई. शर्मिंदगी छिपाने का कोई रास्ता न मिला तो महोदया ने इस स्थानीय जनसमस्या की रिपोर्टिंग को “इंटरनेशनल न्यूज” की संज्ञा दे डाली. शायद उनके लिए अपने वार्ड की जनता का नारकीय जीवन में रहना एक मामूली बात है, और उस पर आवाज उठाना उन्हें वैश्विक साजिश नजर आता है. साहिबा को समझना चाहिए कि जब कचरा घर की दहलीज तक पहुंच जाए, तो वह खबर “लोकल” नहीं, बल्कि निगम की विफलता का “इंटरनेशनल” सर्टिफिकेट बन जाती है.
निष्पक्षता का रोना और रटा-रटाया विलाप
जब लापरवाही की पोल खुलती है, तो अक्षम जनप्रतिनिधियों का सबसे प्रिय हथियार होता है, ”पत्रकारिता पर सवाल उठाना”. वार्ड 17 की पार्षद ने भी वही किया, रिपोर्टिंग को पक्षपातपूर्ण बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की नाकाम कोशिश की. जनता पूछ रही है कि क्या वह सड़ांध “पक्षपातपूर्ण” थी? क्या वह महामारी का खतरा “पेड न्यूज़” था? असल में, जब सच्चाई आईने की तरह सामने आती है, तो आईने से ही शिकायत होने लगती है. चुनाव के समय घर-घर जाकर हाथ जोड़ने वाले ये “सफेदपोश” आज जनता के आक्रोश से इतने डर गए हैं कि उन्हें सच भी कड़वा जहर लग रहा है.
जेसीबी तो चल गई, पर क्या नीयत साफ होगी?
शनिवार को चली जेसीबी ने सड़क तो साफ कर दी, लेकिन नगर निगम और स्थानीय पार्षद के माथे पर लगी “लापरवाही” की कालिख को धोना इतना आसान नहीं है. यह सफाई जनता के प्रति प्रेम नहीं, बल्कि बेनकाब होने का डर है.