Hazaribagh Forest Fire: हजारीबाग जिले के फेफड़े कहे जाने वाले जंगल इन दिनों आग की भीषण लपटों में घिरे हुए हैं. विडंबना यह है कि हर साल पर्यावरण संरक्षण और पौधरोपण के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, लेकिन गर्मी दस्तक देते ही जंगलों का धधकना बदस्तूर जारी है. जिला प्रशासन और वन विभाग की इस मामले पर रहस्यमयी चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है. कागजों पर तो जंगलों को बचाने की बड़ी-बड़ी योजनाएं दर्ज हैं, पर धरातल पर आग बुझाने के इंतजाम और मुस्तैदी नदारद दिख रही है.
बेजुबान वन्य जीवों पर मंडरा रहा मौत का साया
जंगलों में लगी यह आग सिर्फ पेड़ों को राख नहीं कर रही, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी काल साबित हो रही है. आग की चपेट में आने से अनगिनत छोटे जीव-जंतु, दुर्लभ पक्षी और सरीसृप दम तोड़ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इस आग की वजह से पक्षियों के घोंसले और अंडे नष्ट हो रहे हैं, जिससे जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है. वहीं दूसरी ओर, जंगलों से निकलने वाला जहरीला धुआं आसपास के वातावरण को प्रदूषित कर रहा है जिससे आम जनजीवन को सांस लेने में कठिनाई हो रही है.
फाइलों में कैद सुरक्षा और जमीन पर फैला विनाश
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग की निगरानी केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित है. हर साल लाखों-करोड़ों की राशि अग्निरोधी प्रबंधन और फायर लाइन दुरुस्त करने के लिए आवंटित की जाती है, लेकिन जब वास्तव में आग लगती है तो न गश्ती दल नजर आता है और न ही आधुनिक संसाधन. गश्ती दल की अनुपस्थिति और ग्रामीणों के साथ संवाद की कमी के कारण शरारती तत्वों के हौसले बुलंद हैं. जनता अब यह पूछ रही है कि आखिर वन विभाग की जिम्मेदारी केवल "पौधारोपण की फोटो" खिंचवाने तक ही क्यों सीमित रह गई है.
दोषियों पर कार्रवाई न होना बढ़ा रहा है हौसले
जंगलों में आग लगने की घटनाएं कोई प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि अक्सर मानवीय लापरवाही या जानबूझकर की गई साजिश का नतीजा होती हैं. इसके बावजूद अब तक एक भी बड़ा मामला सामने नहीं आया है जहां आग लगाने वाले असली कसूरवारों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई हुई हो. प्रशासन की इस सुस्ती से पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश है. यदि समय रहते फायर लाइन की सफाई और वनकर्मियों की सक्रियता नहीं बढ़ाई गई, तो हजारीबाग के ये सुरक्षा कवच केवल इतिहास के पन्नों में ही शेष रह जाएंगे.