Jharkhand News: छठ पूजा हिंदू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाने वाला पर्व है. इसे सूर्य देव और छठी मैया की आराधना का त्योहार माना जाता है. इस व्रत को सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है, क्योंकि इसमें व्रती को करीब 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखना पड़ता है. चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में नियम, आस्था और परंपराओं का विशेष महत्व होता है. साल में दो बार मनाए जाने वाले इस पर्व का एक रूप चैत्र महीने में भी मनाया जाता है, जिसे चैती छठ कहा जाता है. इस दौरान श्रद्धालु सूर्य देव और छठी मैया से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की प्रार्थना करते हैं.
22 मार्च से शुरू होगा चैती छठ
पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से छठ पर्व की शुरुआत होती है और यह सप्तमी तिथि तक चलता है. वर्ष 2026 में चैती छठ का पर्व 22 मार्च से शुरू होकर 25 मार्च 2026 तक मनाया जाएगा. इन चार दिनों में अलग-अलग विधि-विधान और धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं.
पहला दिन: नहाय-खाय से होती है शुरुआत (22 मार्च)
छठ पूजा का पहला दिन नहाय-खाय कहलाता है. इस दिन व्रती सुबह नदी, तालाब या किसी पवित्र जल स्रोत में स्नान करते हैं. इसके बाद घर में शुद्ध और सात्विक भोजन तैयार किया जाता है. परंपरा के अनुसार इस दिन कद्दू की सब्जी, चना दाल और अरवा चावल का भात बनाया जाता है. व्रती इस प्रसाद को ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं. नहाय-खाय का उद्देश्य शरीर और मन को आने वाले कठिन व्रत के लिए तैयार करना होता है.
दूसरा दिन: खरना के साथ शुरू होता है निर्जला व्रत (23 मार्च)
छठ पर्व का दूसरा दिन खरना कहलाता है, जिसे कुछ जगहों पर लोहंडा भी कहा जाता है. इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को सूर्यास्त के बाद पूजा करते हैं. पूजा के बाद गुड़ की खीर, रोटी या पुड़ी और केला का प्रसाद ग्रहण किया जाता है. इसके बाद से ही 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है.
तीसरा दिन: डूबते सूर्य को दिया जाता है अर्घ्य (24 मार्च)
छठ पूजा के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य दिया जाता है. इस दिन व्रती और श्रद्धालु नदी, तालाब या घाटों पर एकत्र होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं. व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य देव को दूध और जल से अर्घ्य देते हैं. पूजा के दौरान बांस के सूप या टोकरी में ठेकुआ, फल, गन्ना, नारियल और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं.
चौथा दिन: उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ व्रत का पारण (25 मार्च)
छठ पर्व के अंतिम दिन उषा अर्घ्य दिया जाता है. इस दिन श्रद्धालु सूर्योदय से पहले घाटों पर पहुंचते हैं और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं. इसे उदयाचल सूर्य को अर्घ्य देना भी कहा जाता है. इसके बाद व्रती अपने 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण करते हैं और छठ पूजा का समापन होता है.
छठ पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति और सूर्य उपासना का प्रतीक भी है. इस पर्व में पूरे परिवार और समाज की भागीदारी देखने को मिलती है, जो इसे और भी खास बनाती है.