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  • 2026-02-17

Jamshedpur Politics: कांग्रेस जिला अध्यक्ष की विफलता, मानगो में नहीं संभली बगावत, चुनाव में होगा नुकसान?

Jamshedpur Politics: मानगो नगर निगम चुनाव के दौरान कांग्रेस के भीतर मची रार को संभालने में नए जिला अध्यक्ष परविंदर सिंह पूरी तरह विफल साबित हो रहे हैं. जिला नेतृत्व की ढिलाई और रणनीति के अभाव के कारण पार्टी के भीतर अनुशासन की दीवार ढह गई है. आलम यह है कि कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार सुधा गुप्ता के खिलाफ पार्टी के ही दो नेताओं की पत्नियां चुनाव मैदान में ताल ठोक रही हैं, जिससे कांग्रेस की राह मुश्किल नजर आ रही है.

जिला अध्यक्ष की लापरवाही पड़ी भारी
पार्टी के पुराने नेताओं का मानना है कि यदि जिला अध्यक्ष परविंदर सिंह ने नामांकन से पूर्व ही बैठक कर असंतुष्टों के साथ संवाद किया होता, तो यह स्थिति पैदा नहीं होती. नामांकन प्रक्रिया के दौरान जिला इकाई की चुप्पी ने बागियों को शह दी, जिसका नतीजा अब कार्यकर्ताओं के निष्कासन के रूप में सामने आ रहा है. पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि नया नेतृत्व जमीनी समीकरणों और आंतरिक असंतोष को भांपने में नाकाम रहा है.

देरी से हुई कार्रवाई, अब नुकसान की आशंका
भारी दबाव के बाद कांग्रेस ने जितेंद्र सिंह को 6 साल के लिए पार्टी से निकाल दिया है. जितेंद्र सिंह अपनी पत्नी पार्वती देवी के पक्ष में जमकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं. इससे पहले फिरोज खान की पत्नी जेबा खान के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी. हालांकि, राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अब यह कार्रवाई केवल औपचारिकता मात्र है, क्योंकि नामांकन के बाद प्रत्याशी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.

पुराने वादों को भूल फिर बागी हुए जितेंद्र
कार्यालय प्रभारी द्वारा जारी पत्र के अनुसार, जितेंद्र सिंह का बागी इतिहास पुराना है. वे पहले भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी लाइन के खिलाफ जा चुके हैं. पिछली बार माफी मांगकर वापसी करने के बावजूद उन्होंने नगर निगम चुनाव में फिर से अनुशासन तोड़ा. पार्टी ने अब उन्हें बाहर का रास्ता तो दिखा दिया है, लेकिन चुनाव प्रचार में डटे ये बागी प्रत्याशी कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाने के लिए तैयार हैं.

मानगो की यह स्थिति कांग्रेस के जिला नेतृत्व की संगठनात्मक कमजोरी को दर्शाती है. जिला अध्यक्ष द्वारा समय रहते “डैमेज कंट्रोल” न कर पाना यह बताता है कि कार्यकर्ताओं पर नेतृत्व की पकड़ कमजोर हुई है. चुनावी राजनीति में नामांकन के बाद हुई कार्रवाई केवल कागजी साबित होती है, क्योंकि बागी प्रत्याशी मैदान में रहकर आधिकारिक उम्मीदवार के मतों का विभाजन ही करते हैं. सुधा गुप्ता के लिए अब चुनौती प्रतिद्वंद्वी दलों से ज्यादा इन घर के बागियों से निपटने की है.
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