हालांकि, गृह विभाग द्वारा अधिकारियों की अनुपलब्धता को लेकर दिया गया यह तर्क भ्रामक बताया जा रहा है। तथ्य यह है कि झारखंड कैडर के डीजी रैंक के तीन वरिष्ठ अधिकारी—अनिल पालटा, प्रशांत सिंह और एम.एस. भाटिया—में से कोई भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं है। इन अधिकारियों की सेवा अवधि भी क्रमशः एक वर्ष, दो वर्ष और तीन वर्ष शेष बताई जा रही है। इसके बावजूद सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले वरीयता क्रम में उनसे कनिष्ठ अधिकारी को डीजीपी नियुक्त कर दिया गया।
आरोप है कि यह नियुक्ति प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले का उल्लंघन है, क्योंकि डीजीपी का चयन यूपीएससी के पैनल से नहीं किया गया। इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा स्वयं बनाई गई डीजीपी नियुक्ति नियमावली में निर्धारित वरीयता क्रम का भी पालन नहीं किया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि डीजीपी पूरे राज्य के पुलिस बल का मुखिया होता है। ऐसे संवेदनशील पद पर नियुक्ति में पक्षपात और नियमों की अनदेखी से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। इससे ट्रांसफर-पोस्टिंग में लेनदेन, वसूली-रंगदारी और फर्जी मामलों जैसी समस्याओं के पनपने का खतरा बढ़ जाता है।
अनुराग गुप्ता के मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि उनकी नियुक्ति के लिए नियमों को नजरअंदाज किया गया। एसीबी और सीआईडी का प्रभार सौंपकर कथित तौर पर चल रही भ्रष्टाचार जांच को प्रभावित करने का प्रयास हुआ, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अंततः उन्हें रातोंरात पद से हटाना पड़ा।
इस पूरे प्रकरण को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से संवैधानिक प्रावधानों और न्यायालय के दिशा-निर्देशों का सम्मान करने की अपील की जा रही है। साथ ही डीजीपी नियुक्ति में हुए कथित पक्षपात की समीक्षा कर त्रुटियों को सुधारने की मांग उठ रही है।